मंत्री का बंगला या नया ‘पावर सेंटर’? खाद्य मंत्री के पीए को लेकर भाजपा में बढ़ी चर्चा
कार्यकर्ताओं से दूरी और मुलाकातों के ‘फिल्टर’ किए जाने के आरोप; 130 करोड़ के गुड़ टेंडर से जुड़ी चर्चाओं ने भी खींचा ध्यान
रायपुर। छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार में मंत्रियों के कार्यालयों की कार्यप्रणाली को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। अब खाद्य मंत्री दयाल दास बघेल के निज सचिव संतोष अग्रवाल को लेकर भाजपा के भीतर ही कथित असंतोष और उनकी बढ़ती दखलंदाजी की चर्चाएं राजनीतिक गलियारों में जोर पकड़ रही हैं। कार्यकर्ताओं और पार्टी से जुड़े कुछ लोगों का दावा है कि मंत्री से मुलाकात और संवाद की प्रक्रिया में निज सचिव की भूमिका जरूरत से ज्यादा प्रभावशाली हो गई है। भाजपा से जुड़े कार्यकर्ताओं का कहना है कि मंत्री से मिलने आने वाले लोगों की गतिविधियों और मुलाकातों पर निज सचिव की नजर रहती है। आरोप है कि कई मामलों में मंत्री से मिलने वाले कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों के बारे में पहले से जानकारी जुटाई जाती है और मुलाकात के बाद भी उसकी राजनीतिक व्याख्या की जाती है। इसी को लेकर पार्टी के भीतर यह सवाल उठ रहा है कि मंत्री और कार्यकर्ताओं के बीच संवाद का माध्यम कहीं स्वयं एक अलग प्रभावशाली केंद्र तो नहीं बन गया है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि मंत्री से मिलने के लिए भी किसी मध्यस्थ की स्वीकृति जरूरी महसूस होने लगे तो इससे संगठन और जनप्रतिनिधि के बीच स्वाभाविक संवाद प्रभावित हो सकता है।
=बंगले की बैठकों और राजनीतिक पहुंच पर नजर
चर्चा यह भी है कि मंत्री के बंगले पर आने वाले नेताओं, पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को लेकर निज सचिव की सक्रियता बढ़ी हुई है। कुछ लोगों का आरोप है कि कौन व्यक्ति मंत्री के कितना करीब है और किसकी किस मुद्दे पर बातचीत हुई, इसे लेकर भी जानकारी रखने की कोशिश की जाती है। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि ऐसी किसी व्यवस्था के संबंध में मंत्री कार्यालय की ओर से कोई औपचारिक निर्देश है या नहीं। यही वजह है कि पार्टी के भीतर अब इस पूरी कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
=पुरानी राजनीतिक टिप्पणी फिर चर्चा में
इसी बीच भाजपा के भीतर एक पुराना राजनीतिक प्रसंग भी चर्चा में आ गया है। सूत्रों के अनुसार, प्रदेश के एक पूर्व मंत्री एवं वर्तमान रायपुर विधायक ने किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में मंत्री दयाल दास बघेल के साथ उनके निज सचिव को देखकर कथित तौर पर उनसे सावधान रहने की सलाह दी थी। उस समय यह टिप्पणी कितनी गंभीरता से ली गई, यह स्पष्ट नहीं है, लेकिन वर्तमान में निज सचिव की भूमिका को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच यह पुराना प्रसंग फिर राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया है।
=130 करोड़ के गुड़ टेंडर ने बढ़ाई थी विभागीय हलचल
खाद्य विभाग से जुड़े करीब 130 करोड़ रुपये के गुड़ खरीदी टेंडर का मामला भी इस पूरे घटनाक्रम के बीच चर्चा में है। टेंडर की प्रक्रिया और दरों को लेकर सवाल उठने के बाद इसे निरस्त किए जाने की बात सामने आई थी। इसके बाद विभागीय स्तर पर खरीदी प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में चर्चाएं तेज हुई थीं। हालांकि इस मामले में किसी घोटाले या भ्रष्टाचार की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए टेंडर प्रकरण को निज सचिव की व्यक्तिगत भूमिका से जोड़कर कोई निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। लेकिन राजनीतिक चर्चाओं में दोनों विषयों को एक साथ उठाया जा रहा है।
=मंत्रियों के कार्यालयों में ‘पावर सेंटर’ का सवाल पहले भी उठा
भाजपा सरकार के कार्यकाल में मंत्रियों के कार्यालयों में पदस्थ निज सचिवों और ओएसडी की भूमिका को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। कुछ मंत्रियों के कार्यालयों में पदस्थ लोगों को हटाए जाने के बाद यह संदेश गया था कि मंत्री के नाम पर किसी समानांतर प्रभाव केंद्र को बढ़ावा नहीं दिया जाएगा। ऐसे में खाद्य मंत्री के निज सचिव को लेकर उठ रही चर्चाओं ने एक बार फिर यही सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या मंत्रियों के कार्यालयों में पदस्थ निजी स्टाफ की भूमिका और उनके प्रभाव की समय-समय पर समीक्षा की जानी चाहिए?
=मंत्री की सहज छवि बनाम स्टाफ को लेकर शिकायतें
दयाल दास बघेल की राजनीतिक पहचान लंबे समय से सहज और कार्यकर्ताओं के बीच उपलब्ध रहने वाले नेता की रही है। यही वजह है कि उनके कार्यालय से जुड़े किसी व्यक्ति की कार्यशैली को लेकर असंतोष की चर्चा सामने आती है तो उसका राजनीतिक असर भी चर्चा का विषय बन जाता है।
भाजपा कार्यकर्ताओं का एक वर्ग मानता है कि मंत्री और कार्यकर्ताओं के बीच सीधा संवाद संगठन की मजबूती के लिए जरूरी है। ऐसे में यदि किसी निज सचिव की भूमिका को लेकर लगातार शिकायतें अथवा धारणाएं बन रही हैं तो नेतृत्व को कम से कम इनकी वास्तविकता की पड़ताल करनी चाहिए।
=अब निगाह संगठन की प्रतिक्रिया पर
फिलहाल पूरा मामला आरोपों, चर्चाओं और राजनीतिक दावों के स्तर पर है। न तो इन आरोपों की कोई आधिकारिक पुष्टि हुई है और न ही मंत्री या उनके निज सचिव की ओर से सार्वजनिक रूप से अपना पक्ष रखा गया है। ऐसे में अब सवाल यह है कि भाजपा संगठन इन चर्चाओं को महज अंदरूनी राजनीतिक असंतोष मानकर छोड़ता है या फिर मंत्री कार्यालय की कार्यप्रणाली को लेकर सामने आ रही शिकायतों की वास्तविकता जानने के लिए कोई समीक्षा करता है। क्योंकि मामला सिर्फ एक निज सचिव की भूमिका का नहीं, बल्कि मंत्री और संगठन के बीच संवाद की पारदर्शिता और भरोसे का भी है।
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